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चुनाव याद आ गए, चुनाव से पहले राम भी याद आ गए,

देश में साल 1992 से राम मंदिर को बनाने की मुहिम जारी है। मोदी सरकार 2014 में चुनावी घोषणा पत्र में राम मन्दिर निर्माण को शामिल किया था। 30 सितंबर 2010 को रामन्दिर को तीन हिस्से निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान में बांट दिया था। ऑल मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सदस्य जफरयाब जिलानी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

बीते चार साल से आरएसएस और हिन्दू संतो का सब्र का बांध टूट रहा है। हाल ही में नाराज़ हिन्दू सन्तो ने मोदी सरकार को अध्यादेश लाने का सुझाव दिया है।आज आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बयान दिया कि ” सरकार को राम मन्दिर निर्माण के लिए कानून बनाना चाहिए। अगर राम मंदिर पर राजनीति नहीं तो राम मंदिर का बहुत पहले बन जाता। इस महीने में भागवत ने चार बार मन्दिर का जिक्र कर अपनी बेसब्री ज़ाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट में आगामी तारिक 29 अक्टूबर को राम मन्दिर पर सुनवाई होने जा रही है। चुनावी साल है राजनीतिक पार्टियों के लिए सत्ता को पाने का ख्याल है।

क्या मोदी सरकार तीन तलाक़ की तरह राम मंदिर पर अध्यादेश लाएगी? वही दूसरी ओर उद्धव ठाकरे ने कहा कि “राम मंदिर आंदोलन में शिवसेना ने सबसे ज्यादा बलिदान दिया है। आने वाली तारिक 25 नवम्बर को वह अयोध्या जमीन से मन्दिर को लेकर प्रधानमंत्री से सवाल करेंगे।

अपने बोल सियासी बोल,

तंज़ीम राणा

मेरा भारत कहाँ खड़ा है …..

भारत मेरे से भी बड़ा है,

भारत के वज़ीरे आजम से भी बड़ा है,

लोगों को समझ क्यो नहीं आता

देश के लिए विदेश नीति स्तर पर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितने निचली स्तर पर
खड़ा हैं।

#विदेश सम्बन्ध

अपने बोल, सियासी बोल

कहाँ खड़ा है …..

भारत मेरे से भी बड़ा है,

भारत के वज़ीरे आजम से भी बड़ा है,

जो सीमा पर खड़ा जवान खेल रहा जान की बाज़ी,

उस जवान से भी बड़ा मेरा भारत,

लोगों को समझ क्यो नहीं आता

देश के लिए विदेश नीति स्तर पर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितने निचली स्तर पर
खड़ा हैं।

#विदेश सम्बन्ध

अपने बोल, सियासी बोल

माँ

छूट गया वो माँ का आँचल,
वो रातो की लोरी , वो चाँदनी रातो का कल
माँ की ममता को याद कर घबराता हूं हर पल.
जिन लोरी को सुनकर लगता था मन.
अब नींद से सहम कर उठ जाता हूं हर पल.

बच्पन की मीठी नींद से जगाती थी माँ , हर रोज़ नई सुबह के साथ दुलार थी माँ , बच्चें के घर लैट होने पर दरवाज़ों पर निगाए रखती और कहाँ सोती थी माँ. माँ का सुकून अपने बच्चें की आंखों में मिलता है, जब ही तो हर रोज डॉट कर सुला देती माँ.

बारिश में नहाने से क्यों मना करती थी माँ, कुछ खाने की चीज़ें को क्यों बचा कर रखती थी माँ,

महौल्ले के बच्चें के साथ क्यो खेलने से मना करती थी माँ, चोटिल होने पर क्यो सहम कर रोने लगती थी माँ,

दोस्ती का सफ़र…..

कभी कुछ कहानी बयां नहीं की जा सकती हैं, शब्द के साथ लिखी जा सकती. मेरा आज का दिन काफ़ी भाग- दौड़ वाला दिन रहा, इतना कि वह लड़की मेरा सेक्टर 16 के बाहर आँखों की टिक – टिकी लगाए इंतजार कर रही थी। कई बार उसने मुझे कॉल कर बताया कि मेरा ऑफिस ओवर हो गया है. जब उसका फ़ोन आता मेरे मन मे एक बैचनी छा जाती और सेक्टर 16 तक का सफ़र दूर लगने लगता। शायद मुझे उसका डर या इंतज़ार कराना बुरा लग रहा था। ई-रिक्शा भी रेड लाइट पर रुक रहा था। मैंने हड़बड़ाहट के साथ रिक्शा वाले भईया से कहा साइड से निकाल लो , लेकिन वह रेड लाइट से की येल्लो लाइट होने का इंतजार कर रहे थे। आखिरकार मैं रेड लाइट पर रिक्शे से उतरकर भागने लगा ,उस इंतज़ार कर रही लडक़ी की ओर. हाँफती साँसों के साथ मैने उसको देख लिया औऱ उसने मुझे भी भीड़ में देख लिया.लेकिन जब मैंने बोलना शुरू किया अपनी हाँफती साँसों का उसको अहसास तक नहीं होने दिया। चलो अशोका रोड़ चलते है, वह बोल रही थी कि आज कुछ तबियत सी ठीक नहीं है । मैंने उसके की ओर देखकर कहा मेरा फ़ोन चार्ज नहीं मुझे प्रोब्लेम हो जाएगी । और अपने सासंद को मॉनसून सत्र के लिए आवेदन देना है । अगर बैटरी डाई हो गई , फिर कैसे मैं अपने सासंद से सम्पर्क जुटा पाऊँगा। उसने भी अपने 10% बैटरी दिखाकर तर्क दिया कि मेरा फ़ोन भी चार्ज नहीं हैं। अब हम दोनों कम बैटरी फ़ोन के बावजूद ऑफिस टाइम वाली मेट्रो में आशोका रोड़ की ओर चल दिए। वो मेट्रो में ऑफिस वाली भीड़ की वज़ह से अनकंफर्टेबल सा महसूस कर रही थी। खेर मैंने कुछ गप -शप करके उसके ध्यान को भीड़ से हटाने की कोशिश की। हमने राजीव चौक पर ऑटो वाले भईया से पूछा अशोका रोड कितना दूर है। उन्होंने कहा काफ़ी दूर है, फिर हमनें ऑटो लेकर अशोका रोड कोठी न० 15 पर पहुँच गए। कोठी के बाहर बड़े -बड़े शब्दों में लिखा था , सासंद डॉ संजीव बालियान । जैसे ही हमने एंटर किया ,सुरक्षा में तैनात जवान ने पूछा किससे मिलना है। मैंने बेबाकी से कहा मेंबर ऑफ पार्लियामेंट डॉ संजीव बालयान से मुलाकात करनी है। तैनात जवान ने जवाब में कहा इधर से ऑफिस की ओर चले जाओ। मैं ओर वो लड़की सहमे क़दमो से ऑफिस में चले गए। वहाँ राहुल नाम शख्स ने पूछा क्या काम है? मैने कहा कि संसद का मानसून सत्र की कार्यवाही देखनी है। और मानीय सांसद का डॉ संजीव बालयान का इंटरव्यू शूट करना है। उसके बाद दोनों चेयर पर बैठ गए। ऐसा लग रहा था कि वो लड़की रांची होने की वजह से एम .पी साहब संसद का पास जारी न करे। क्योंकि एक सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र के लोगो ही पास जारी करता है। राहुल ने बेफिक्री के साथ कहा चलो दोनों की सासंद जी से मुलाकात कराता हूँ. हम दोनों उनके पीछे – पीछे चल दिए। मेरे मन में एक सवाल उठ रहा था कि इंटरव्यू के लिए हा कर दी अगर फ़िर कैसे शूट करेंगे। मुझे मेरे साथ लड़की के दिमाग़ क्या चल रहा था ? लेकिन उसके चहरे पर लज्जा झलक रही थी। क्योंकि रांची से आती हैं , उसका क्या नाता सांसद महोदय से. जैसे ही हम आदरणीय सांसद के पास बैठे, उन्होंने ने कहा पहले दोनों बच्चे परिचय कराए। पहले उस लडक़ी ने ऐसा परिचय दिया कि सर मैं रांची से और नोएडा फ़िल्म मारवाह स्टूडियो से पढ़ाई कर रही हूं. उसके बाद सांसद सहाब का फ़ोन बजने लगा। मुझे अपने मन में परिचय तैयार करना करने का मौका मिल गया. फ़ोन कटने के बारे मैंने अपना परिचय दिया। उसके बाद नेता जी ठहाँके लगा कर हँसने लगे। मैं इतने में कुछ समझ पाता उन्होंने ने कहा तुम ऐसे गांव से आते हो जहाँ कम लोग पढ़ते है। मुझे बहुत खुशी है आप यहाँ पढ़ रहे हो। अब मेरे औऱ नेता के बीच शर्म गायब सी हो गई। मैंने कहा जब मैंने आपसे बात की अपना पन सा महसूस हुआ। आख़िरकार उन्होंने इंटरव्यू के लिए हा कर दी थी। हम दोनों खुशी की हँसी के साथ गुद – गुदाते हुए, कोठी से बाहर आ गए। अब हम दोनों गप – शब करते हुए पैदल ही राजीव चौक मेट्रो की ओर जा रहे थे। रास्ते मे एक पालतू डॉग भौक कर रहा था, मैने सहम कर उसका बैग पकड़ लिया। उसे डॉग के भौकने का डर नहीं था। बल्कि चलती सड़क पर वाहनों के शोर के बीच खिल -खिलाकर हँस रही थी। कह रही तुम्हारे बारे में सबको बताऊँगी, डॉग से डरके मेरे बैग के पीछे छुप रहे हो। मैं भी उसके साथ खुलकर हँसने लगा अपने डर पर । उसे डॉग से कही ज़्यादा डर ये सता रहा था , कि कही मम्मी का फ़ोन न आ जाए। मैने उसे दिलासा दिया हम समय पर पहुँच जाएगे। हम बातो में इतना मशगूल हो गए और भटककर इंडिया गेट पहुँच गए। उसने मेरी तरफ देखा कहा मैं बहुत थक गई हूं। उसके बाद ऑटो लेकर सीपी यानी राजीव चौक आ गए। चलो कुछ स्टोल पर कुछ खाते है। हम खाने के लिए स्टोल खोज रहे थे,लोग वहाँ गिटार की धुन में तन्हाई खोज रहे थे। चलो ये राम लड्डू खाते है , ओह राम लड्डू! मैने कहा कैसे राम लड्डू खाये। उसके बाद हम सीपी के वाइट पिल्लरों की बीच आधे घँटे तक स्टोल ही तलाश करते रहे । कुछ न मिलने पर हताशा के साथ सेक्टर 16 लौट आए. लेकिन मम्मी के फ़ोन का डर और रूम पर पहुँचने की फ़िक्र दोनों ही बात उसके भीतर भय पैदा कर रही थी। खेर ! देर – सबेर थकी हारी रूम पर पहुंच गई। लौटते समय उसके रूम के पास एक पालतू डॉग को आँटी घूमा रही थी। अब की बार मैंने डर से झटपटा कर उसका बैग नही पकड़ा। मुझे डर था ,कही वो सुनसान सड़क पर फिर खिल -खिलाकर मेरे डर पर न हँस दे………….कहानी एक दोस्ती लप्रेक है।

क्यो मॉब लिनचिंग से सिहर हो उठा हिंदुस्तान ?

जब भी कोई नेता बोलेगा ,

मॉब लिनचिंग पर नाप – तोल के मुँह खोलेगा,

क्या सहम गया हिंदुस्तान,

मॉब लिनचिंग पर क्यो बट गया हिंदुस्तान,

क़ासिम को क्यों मारे धर्म के नाम पर इन्सान,

भीड़ तंत्र में क्यों शामिल है शैतान,

हिंदुस्तान क्यों माँगे अपनी पुरानी आपसी सद्भावना- सौहार्द की पहचान

क्यो टीवी चैनलों पर जाकर मज़हबी नेता करते बखान,

क्या मॉब लिनचिंग से बदनाम हो गया मेरा हिंदुस्तान,